आप लोग कमज़ोर, छिछले कैरियरवादी बुद्धिजीवी हैं और `बिगुल´ हिरावलपन्थी अख़बार है!

(जून-जुलाई 1999, पी.पी. आर्य का पत्र)
बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप पर जारी बहस : एक पत्र और उसका उत्तर
`बिगुल´ के अप्रैल 1999 अंक में हमने “`बिगुल´ के लक्ष्य और स्वरूप पर एक बहस और हमारे विचार” शीर्षक से एक सम्पादकीय छापा था।
इस सम्पादकीय पर हमें एक पत्र प्राप्त हुआ है। `बिगुल´ के पाठकों और वितरक-संवाददाता-सहायक [...]

`बिगुल´ के लक्ष्य और स्वरूप पर एक बहस और हमारे विचार

(बिगुल, अप्रैल 1999)
`बिगुल´ का पाठक कौन है? मज़दूरों के किस हिस्से तक पहुँचना इसका मकसद है? – इन सवालों पर अख़बार से जुड़े संगठनकर्ताओं-कार्यकर्ताओं-हमदर्दों के बीच लगातार बहस-बातचीत होती रहती है। कुछ हलकों से, और विशेष तौर पर बुद्धिजीवी साथियों की ओर से यह शिकायत भी आती है कि आम मज़दूर या औसत मज़दूरों [...]

कुछ ज्यादा ही लाल… कुछ ज्यादा ही अन्तरराष्ट्रीय

(बिगुल के स्वरूप पर आत्माराम का पत्र) (जुलाई-अगस्त 1996)

कुछ ज्यादा ही लाल… कुछ ज्यादा ही अन्तरराष्ट्रीय

पिछले दिनों `बिगुल´ को मुम्बई में रहने वाले एक मार्क्सवादी बुद्धिजीवी आत्माराम जी का एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने `बिगुल´ से प्रकाशित सामग्री की आलोचना प्रस्तुत करते हुए बहुत सारे सुझाव दिये हैं। चूँकि इस पत्र में [...]

एक नये क्रान्तिकारी मज़दूर अख़बार की ज़रूरत

विशेष सम्पादकीय
(बिगुल प्रवेशांक, अप्रैल 1995)
आज एक नये क्रान्तिकारी मज़दूर अख़बार की ज़रूरत है। बेहद, बुनियादी और फौरी ज़रूरत है। बल्कि इस मामले में पहले ही देर हो चुकी है। बेहतर तो यह होता कि यह अखिल भारतीय पैमाने का, कम से कम साप्ताहिक, अख़बार होता जो सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में एक साथ छपता। [...]