आपस की बात

मित्रवत साथियो,
क्या आप जानते हैं कि शोषण करने वाला शोषण सहने वाले से ज्यादा गुनहगार होता है। और सभी जानते हैं, शोषण सहने वाला अधिक परिश्रमी होता है और शोषण करने वाला ऐयाशबाज़ होता है और हवेली में आरामदेह जीवन बिताता है।
लेकिन ऐसा क्यों?
ऐसा सवाल एक नहीं है बल्कि बहुत अधिक संख्या में हैं। लेकिन [...]

चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप: अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू

जनता को सिर्फ यह तय करना है कि वह इसे कितना और बर्दाश्त करेगी!
बिगुल डेस्क
करीब डेढ़ महीने तक चली देशव्यापी चुनावी नौटंकी अब आख़िरी दौर में है। ‘बिगुल’ का यह अंक जब तक अधिकांश पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तब तक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने [...]

आप लोग कमज़ोर, छिछले कैरियरवादी बुद्धिजीवी हैं और `बिगुल´ हिरावलपन्थी अख़बार है!

(जून-जुलाई 1999, पी.पी. आर्य का पत्र)
बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप पर जारी बहस : एक पत्र और उसका उत्तर
`बिगुल´ के अप्रैल 1999 अंक में हमने “`बिगुल´ के लक्ष्य और स्वरूप पर एक बहस और हमारे विचार” शीर्षक से एक सम्पादकीय छापा था।
इस सम्पादकीय पर हमें एक पत्र प्राप्त हुआ है। `बिगुल´ के पाठकों और वितरक-संवाददाता-सहायक [...]

`बिगुल´ के लक्ष्य और स्वरूप पर एक बहस और हमारे विचार

(बिगुल, अप्रैल 1999)
`बिगुल´ का पाठक कौन है? मज़दूरों के किस हिस्से तक पहुँचना इसका मकसद है? – इन सवालों पर अख़बार से जुड़े संगठनकर्ताओं-कार्यकर्ताओं-हमदर्दों के बीच लगातार बहस-बातचीत होती रहती है। कुछ हलकों से, और विशेष तौर पर बुद्धिजीवी साथियों की ओर से यह शिकायत भी आती है कि आम मज़दूर या औसत मज़दूरों [...]