Posted on May 18, 2009 by Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar
चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत देशभर के
सफाईकर्मियों का आईना है
मशहूर भारतीय फ़िल्मकार सत्यजित रे ने अपनी एक फ़िल्म अमेरिका में प्रदर्शित की तो पहले शो में ही बहुत से अमेरिकी फ़िल्म बीच में ही छोड़कर आ गये क्योंकि सत्यजीत रे ने फ़िल्म के एक सीन में भारतीय लोगों को हाथों से खाना खाते [...]
Filed under: अनुराग, चर्चा है कि, बिगुल, मजदूर, ललकार, शोषण-उत्पीड़न, श्रमशक्ति, सर्वहारा | Tagged: इमेजनिंग इण्डिया, मजदूरों का जीवन, वर्ग दृष्टिकोण, सर्वहारा, सस्ती श्रमशक्ति | Leave a Comment »
Posted on May 16, 2009 by Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar
दमन-उत्पीड़न से नहीं कुचला जा सकता मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन
दिल्ली मेट्रो की ट्रेनें, मॉल और दफ्तर जितने आलीशान हैं उसके कर्मचारियों की स्थिति उतनी ही बुरी है और मेट्रो प्रशासन का रवैया उतना ही तानाशाहीभरा। लेकिन दिल्ली मेट्रो रेल प्रशासन द्वारा कर्मचारियों के दमन-उत्पीड़न की हर कार्रवाई के साथ ही मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन और [...]
Filed under: आंदोलन, चर्चा है कि, बिगुल, मजदूर, शोषण-उत्पीड़न, श्रमशक्ति, संघर्ष, सर्वहारा | Tagged: बेरोजगारी, मजदूरों का जीवन, मजदूरों के हक़, सस्ती श्रमशक्ति | Leave a Comment »
Posted on May 16, 2009 by Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar
बिगुल संवाददाता
कारपोरेट जगत में हमेशा ही मजदूरों का मनमाना शोषण होता रहा है लेकिन अब सरकारी उपक्रम भी बेहयाई से श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। वैसे तो मेट्रो रेल कारपोरेशन में श्रम कानूनों के खुले उल्लंघन की ख़बरें कर्मचारियों के आन्दोलन की बदौलत सामने आने लगी हैं लेकिन बेंगलोर मेट्रो तो इसमें भी [...]
Filed under: अनुराग, चर्चा है कि, बिगुल, मजदूर, ललकार, शोषण-उत्पीड़न, श्रमशक्ति, सर्वहारा | Tagged: इमेजनिंग इण्डिया, बाल श्रम, मजदूरों का जीवन, मानव पूँजी, सस्ती श्रमशक्ति | 3 Comments »
Posted on September 10, 2008 by नौभास
लालू जैसे नेता गुरदास गुप्त पर चुटकी इस प्रकार लेते हैं कि जैसे उसने कई दिनों से रोटी न खाई हो | और उन्हें पूंजीवादी अर्थशास्त्र का ककहरा भी समझाते हुए कहते हैं कि रोटी तो तब मिलेगी जब इन्फ्रा स्ट्रक्चर का विस्तार होगा और गुरदास गुप्त पिछले साठ सालों में जनसँख्या वृदि और उत्पादन वृदि के भारी अंतर की व्याख्या करने की बजाए चुपी साधे मंद मंद मुस्कराते रहते हैं
Filed under: चर्चा है कि | Tagged: पुस्तकों सबंधी जानकारी | 1 Comment »