नवउदारवादी अर्थनीति के 18 वर्ष
18 वर्षों पहले नरसिंह राव की सरकार ने जब उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की शुरुआत की थी तो आज के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह तब वित्तमन्त्री थे। उन्होंने तब `ट्रिकल डाउन थ्योरी´ की पिपिहिरी बजाते हुए दावा किया था कि जब समाज के शिखरों पर समृद्धि आयेगी तो वह रिसकर नीचे तक पहुँच जायेगी। तबसे 18 वर्ष बीत चुके हैं। सच्चाइयाँ जो सामने हैं वे मनमोहन सिंह के दावे के एकदम विपरीत हैं। आइये, उन पर एक निगाह डालें। पहले से ही जारी धनी-ग़रीब के बीच की ध्रुवीकरण की प्रक्रिया, आम मेहनतकशों के कंगालीकरण की प्रक्रिया विगत 18 वर्षों में और अधिक तेज़ हो गयी है। – `केपजेमिनी´ और `मेरिल लिंच´ द्वारा तैयार की गयी `एशिया-प्रशान्त सम्पदा रिपोर्ट´ के अनुसार, विगत कुछ वर्षों के दौरान भारत करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि दर की दृष्टि से पूरी दुनिया में वियतनाम के बाद दूसरे स्थान पर रहा है। दिसम्बर 2007 में भारत में 1 लाख 23 हज़ार करोड़पति थे, जो एक वर्ष पूर्व के मुकाबले 23 प्रतिशत अधिक था। करोड़पति वृद्धि दर के मामले में तीसरे स्थान पर चीन आता है। ज्ञातव्य है कि बाज़ार समाजवाद के नाम पर चीन और वियतनाम में भी नवउदारवाद का घटाटोप छाया है, जिसके चलते वहाँ भी सामाजिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज़ गति से जारी है। -’फोब्र्स´ पत्रिका द्वारा जारी सूची के अनुसार, वर्ष 2006 में दुनिया के 946 अरबपतियों में 36 भारतीय शामिल थे। 2005 में दुनिया में 768 अरबपति थे। यानी एक वर्ष में विश्वस्तर पर अरबपतियों की संख्या में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि भारतीय अरबपतियों की संख्या में 64 प्रतिशत की वृद्धि हुई। देश के दस सर्वोच्च खरबपति हर मिनट दो करोड़ रुपये बनाते हैं। अकेले मुकेश अम्बानी हर मिनट 40 लाख रुपये बनाते हैं। दुनिया के शीर्षस्थ 5 महाधनिकों में से दो भारतीय हैं। `फोब्र्स´ पत्रिका द्वारा तैयार दुनिया के अरबपतियों की सूची में 2004 में 9 भारतीय शामिल थे। यह संख्या 2007 तक बढ़कर 40 हो गयी। भारत से बहुत अधिक धनी देश जापान में अरबपतियों की तादाद 2007 में महज़ 24, फ़्रांस में 14 और इटली में भी 14 थी। चीन में तेज़ आर्थिक विकास और तेज़ी से बढ़ती ग़ैरबराबरी के बावजूद 2007 में वहाँ कुल 17 अरबपति ही थे। भारत के अरबपतियों की दौलत महज़ एक साल में, 2006-07 के दौरान 106 अरब डॉलर से बढ़कर 170 अरब डॉलर हो गयी। अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी (फिलहाल, अगस्त-सितम्बर 2008) के अनुसार, अरबपतियों की दौलत में 60 फीसदी बढ़ोत्तरी इसलिए मुमकिन हुई कि राज्य और केन्द्र सरकारों ने खनन, उद्योगीकरण और विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए सार्वजनिक उद्देश्यय् के नाम पर बड़े पैमाने पर ज़मीन निजी कारपोरेशनों को सौंप दी। कारपोरेट मुनाफे के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2000-01 के बाद से अब तक सकल घरेलू उत्पाद में हर अतिरिक्त 1 फीसदी की बढ़ोत्तरी से कारपोरेट मुनाफों में 2.5 फीसदी की बढ़त हुई है। आज़ादी के बाद के छ: दशकों का बैलेंसशीट यह है कि उपर के 22 एकाधिकारी पूँजीपति घरानों की परिसम्पत्ति में 500 गुने से भी अधिक का इज़ाफा हुआ है। इन घरानों में वे बहुराष्ट्रीय निगम शामिल नहीं हैं जिनके शुद्ध मुनाफे में दोगुना-चौगुना नहीं बल्कि औसतन सैकड़ों गुना की वृद्धि हुई है। – 18 वर्षों के नवउदारवादी दौर के बाद, इक्कीसवीं सदी के भारत की ख़ासियत यह है कि यह अरबपतियों की कुल दौलत के लिहाज़ से अमेरिका के बाद दुनिया में दूसरे नम्बर पर है, लेकिन बेघरों, कुपोषितों, भूखों और अनपढ़ों की तादाद के लिहाज़ से भी दुनिया में पहले नम्बर पर है। ऐश्वर्य-समृद्धि की चकाचौंध भरी दुनिया का दूसरा अन्धकारमय पहलू यह है कि (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार) देश की 18 करोड़ आबादी झुग्गियों में रहती है और 18 करोड़ आबादी फुटपाथों पर सोती है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ही अनुसार, ग्रामीण भारत में प्रतिदिन औसत उपभोग मात्रा 19 रुपये और शहरी भारत में 30 रुपये है। गाँवों की दस प्रतिशत आबादी 9 रुपये रोज़ पर गुज़ारा करती है। `नेशनल कमीशन फॉर इण्टरप्राइजे़ज़ इन द अनऑर्गेनाइज़ड सेक्टर´ की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2004-05 में करीब 84 करोड़ लोग (यानी आबादी का 77 फीसदी हिस्सा) रोज़ाना 20 रुपये से भी कम पर गुज़र कर रहे थे । इनमें से 22 फीसदी लोग रोज़ाना 11.60 रुपये की आमदनी पर (यानी सरकारी `ग़रीब रेखा´ के नीचे), 19 फीसदी लोग रोज़ाना 11.60 रुपये से 15 रुपये के बीच की आमदनी पर और 36 फीसदी लोग रोज़ाना 15 से 20 रुपये के बीच की आमदनी पर गुज़ारा कर रहे थे। – सालाना 8-9 प्रतिशत की दर से कुलाँचे मार रही अर्थव्यवस्था (हालाँकि वर्तमान विश्वव्यापी मन्दी के बाद सकल घरेलू उत्पाद की यह वार्षिक वृद्धि दर 6 प्रतिशत पर आ जायेगी, ऐसा अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है) वाला यह देश वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक के अनुसार, 124वें स्थान से नीचे खिसककर 127वें स्थान पर आ गया। भारत में औसत आयु चीन के मुकाबले 7 वर्ष और श्रीलंका के मुकाबले 11 वर्ष कम है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्युदर चीन के मुकाबले तीन गुना, श्रीलंका के मुकाबले लगभग 6 गुना और यहाँ तक कि बांग्लादेश और नेपाल से भी ज्यादा है। भारतीय बच्चों में से तकरीबन आधों का वज़न ज़रूरत से कम है और वे कुपोषण से ग्रस्त हैं। करीब 60 फीसदी बच्चे खून की कमी से ग्रस्त हैं और 74 फीसदी नवजातों में खून की कमी होती है। प्रतिदिन लगभग 9 हज़ार भारतीय बच्चे भूख, कुपोषण और कुपोषणजनित बीमारियों से मरते हैं। 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के 50 फीसदी मामलों का कारण कुपोषण होता है। 5 वर्ष से कम आयु के 5 करोड़ भारतीय बच्चे गम्भीर कुपोषण के शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 63 फीसदी भारतीय बच्चे प्राय: भूखे सोते हैं और 60 फीसदी कुपोषणग्रस्त होते हैं। 23 फीसदी बच्चे जन्म से कमज़ोर और बीमार होते हैं। एक हज़ार नवजात शिशुओं में से 60 एक वर्ष के भीतर मर जाते हैं। लगभग दस करोड़ बच्चे होटलों में प्लेटें धोने, मूँगफली बेचने आदि का काम करते हैं। -अन्तरराष्ट्रीय खाद्यनीति शोध संस्थान की 2007 की रिपोर्ट के अनुसार भुखमरी की दृष्टि से दुनिया के 118 देशों में भारत का स्थान 94वाँ था, जबकि पाकिस्तान का 88वाँ और चीन का 47वाँ। अन्तरराष्ट्रीय खाद्यनीति शोध संस्थान और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किये गये `वैश्विक भूख सूचकांक´ (ग्लोबल हंगर इण्डेक्स) 2008 के अनुसार, दुनिया के 88 देशों में भारत का 66वाँ स्थान है। अफ्रीकी देशों और बांग्लादेश को छोड़कर भूखे लोगों के मामले में भारत सभी देशों से पीछे है। दुनिया में कुल 30 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं और 2015 तक भूख की समस्या मिटा देने के संयुक्त राष्ट्र संघ के आह्वान के बावजूद 2030 तक इनकी संख्या बढ़कर 80 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इस आबादी का 25 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ भारत में रहता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य व कृषि संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में 85 करोड़ 50 लाख लोग भुखमरी, कुपोषण या अल्पपोषण के शिकार हैं। इनमें से लगभग 35 करोड़ आबादी भारतीय है। हर तीन में से एक (यानी लगभग 35 करोड़) भारतीयों को प्राय: भूखे पेट सोना पड़ता है। न तो पूरी दुनिया के स्तर पर और न ही भारत के स्तर पर -पर इसका कारण खाद्यान्न की कमी नहीं, बल्कि बढ़ती महँगाई और आम लोगों की घटती वास्तविक आय है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1991 में प्रति व्यक्ति औसत खाद्यान्न उपलब्धता 580 ग्राम थी जो 2007 में घटकर 445 ग्राम रह गयी। उल्लेखनीय है कि इस दौरान समाज के समृद्ध तबकों (उच्च मध्यवर्ग तक) ने खाने-पीने पर अपना ख़र्च काफी बढ़ाया है। यानी औसत खाद्यान्न उपलब्धता में उपरोक्त अवधि में दर्शायी गयी कमी से भी अधिक कटौती ग़रीब के भोजन में हुई है। उसी रिपोर्ट के अनुसार, उदारीकरण के इन 18 वर्षों के दौरान समाज के ग़रीब हिस्से की प्रतिव्यक्ति कैलोरी खपत में भी काफी कमी आयी है। जहाँ विकसित देशों के लोग औसतन अपनी कुल आमदनी का 10 से 20 फीसदी भोजन पर ख़र्च करते हैं, वहीं भारत के लोग अपनी कुल कमाई का औसतन करीब 55 फीसदी हिस्सा खाने पर ख़र्च करते हैं। लेकिन कम आय वर्ग के भारतीय नागरिक अपनी आमदनी का 70 प्रतिशत भाग भोजन पर ख़र्च करते हैं, और फ़िर भी उसे दो जून न तो भरपेट भोजन मिलता है, न ही पोषणयुक्त भोजन। औसतन एक आदमी को प्रतिदिन 50 ग्राम दाल चाहिए, लेकिन भारत की नीचे की 30 फीसदी आबादी को औसतन 13 ग्राम ही नसीब हो पाता है। वर्ष 2006 से 2007 के बीच दाल की कीमतों में 110 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ। चन्द एक सीज़नल सब्जि़यों को छोड़कर, हरी सब्ज़ी तो ग़रीब खा ही नहीं सकता। प्याज़, टमाटर और आलू तक ख़रीदना भी साल के अधिकांश हिस्से में उसके लिए मुश्किल होता है। आज से 50 वर्षों पहले 5 व्यक्तियों का परिवार एक साल में औसतन जितना अनाज खाता था, आज उससे 200 किलो कम खाता है। ….….इस बोलते-आंकडे, चीखती-सच्चाईयां के बाकी भाग के लिए ……यहाँ देखें \’बिगुल दिसंबर, 2008\’
Filed under: खाद्य संकट, नव सर्वहारा पुनर्जागरण, नव सर्वहारा प्रबोधन, पूंजीवादी संकट, मजदूर, मध्यवर्ग का ऊपरी तबका, मार्क्सवाद, सर्वहारा | Tagged: इमेजनिंग इण्डिया, उत्पादन और उपभोग, उत्पादन और वितरण, चीखती-सच्चाईयां, नवउदारवादी दौर, पूँजी का तर्क, बोलते-आंकडे, मजदूरों का जीवन, मजदूरों के हक़, वर्ग दृष्टिकोण, वैकल्पिक मीडिया, technorati
