गैर- राजनितिक बुद्धिजीवी

गैर- राजनितिक बुद्धिजीवी : ओटो रेनी कैस्टिलो

एक दिन

मेरे देश के

गैर-राजनितिक

बुद्धिजीवियों से

हमारे

सबसे सीधे-साधे लोग

सवाल  करेंगे |

उनसे  पूछा  जाएगा

जब उनका देश

मीठी आग की भांति

छोटा और अकेला

आहिस्ता-आहिस्ता दम तोड़ गया

उन्होंने क्या किया |

कोई नहीं उनसे पूछेगा

उनके परिधान के बारे में

दोपहर की रोटी के बाद

उनकी लम्बी झपकी  के बारे में,

किसी की भी दिलचस्पी

“नाचीज के विचार”

से उनकी नपुंसक झड़पों

में न होगी

उनकी वित-संबंधी उच्च शिक्षा की

कोई परवाह न करेगा |

यूनानी देव कथायों  पर

या उनकी आत्म-ग्लानी के बारे में

जब  उनके अन्दर कोई

कायर की मौत

मरना शुरू हो जाता है

उनसे सवाल नहीं पूछे जायेंगे |

पूर्ण झूठ की

छाया से जन्मे

उनके  बेतुके औचित्यों पर

कुछ नहीं

पूछा जाएगा |

उस दिन

सीधे-साधे लोग आएंगे |

वे जिनका

गैर-राजनितिक बुद्धिजीवियों

की पुस्तकों और किताबों में

कोई जिक्र न था,

परन्तु रोजाना ढ़ोते थे जो

उनकी रोटी और दूध,

केक और अंडे ,

धकेलते थे उनकी कारें,

वे जो उनके बागों और कुत्तों की देखभाल करते थे

और उनके लिए करते थे काम,

और वे पूछेंगे  :

“तुमने क्या किया

जब गरीब पीड़ित थे

जब कोमलता और

जीवन

उनके अंदर भस्म हो गया ?

मेरे मीठे देश के

गैर-राजनितिक बुद्धिजीवियों

जवाब न बन पड़ेगा तुमसे |

चुप्पी का गिद्ध

तुम्हारी आँत नोच लेगा  |

तुम्हारी ख़ुद की कमीनगी

तुम्हारी आत्मा को चुगेगी |

और तुम अपनी शर्म से गूंगे हो जाओगे |

योगेन्द्र
yogendrapjoshi@gmail.com | 59.94.119.46

समाज में मोटे तौर पर तीन प्रकार के लोग मिलेंगे: प्रथम जो अपनी बुद्धि के बल पर जीवनयापन करते हैं और बुद्धिबल के सहारे समाज में प्रतिष्ठा भी पा जाते हैं; दूसरे वे हैं जो दैहिक श्रम के भरोसे जीते हैं और समाज उन्हें सम्मान देने की नहीं सोचता; और तीसरे वे हैं जो किस्मत लेकर पैदा होते हैं, जिनके पास संसाधन होते हैं बिना कुछ किये मौज से जीने के लिये । तीनों ही सुख से जीने की तमन्ना लेकर आते हैं, और यह जरूरी नहीं कि वे समष्टि के हित की कामना लिये हों । जो कुछ अलग होते हैं वे तीनों वर्गों में होते हैं और अपवाद होते हैं न कि नियम !

- योगेन्द्र जोशी (indiaversusbharat.wordpress.com; hinditathaakuchhaur.wordpress.com;
jindageebasyaheehai.wordpress.com; vichaarsankalan.wordpress.com)


शहीद भगत सिंह विचार मंच, संतनगर

इस सामाजिक आर्थिक प्रबंध में, मनुष्य की किस्म उसकी सामाजिक भूमिका और रोज़ी-रोटी के लिए उस द्वारा अपनाए जाने वाले ढंगों से निर्धारित होती है. निजी संपत्ति की नींव पर टिके इस प्रबंध में, प्रत्येक आदमी को अपनी भूमिका स्वयं चुनने की स्वतंत्रता नहीं है. जन्मजात किस्मत का धनी कोई पैदा नहीं होता. इस वर्गीय समाज में, उसकी आर्थिक हैसियत ही उसे किस्मत का धनी या बदकिस्मत बनाती है. यह सामाजिक आर्थिक हैसियत किसी मनुष्य की जन्मजात विशेषता के कारण नहीं होती.

कुछ लोग अपनी जीविका के लिए, अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या मानसिक. दूसरे लोग, पूँजी के मालिक होने की हैसियत से श्रम शक्ति खरीदते हैं और इसी प्रक्रिया द्बारा अपनी पूँजी में वृद्धि करते हैं. इसी आधार पर, मोटे तौर पर समाज में दो तरह के लोग हैं, एक पूँजी के मालिक और, दूसरे श्रम शक्ति बेचकर जिन्दा रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग. अपनी वर्गीय स्थिति की बदौलत मजदूर वर्ग, अपनी श्रम शक्ति बेचने की मजबूरी के कारण पूंजीपतियों की बेरहम लूट का शिकार होते हैं.

समाज के अन्य तबके व वर्ग, समाज के इन दो मुख्य वर्गों के बीच इन वर्गों के सहयोगी या विरोधी की भूमिका अदा करते हैं. मानवीय इतिहास की एक विशेष मंजिल पर मानवीय श्रम का शारीरिक और मानसिक श्रम में विभाजन हो गया. शारीरिक श्रम या मानसिक श्रम विशेष इतिहासिक परिस्थितियों की पैदावार है न कि किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की जन्मजात विशेषता. समाज के विकास की विकसित मंजिल में यह विभाजन भी आलोप हो जाएगा.

एक गैर राजनितिक बुद्धीजीवी, इस सच्चाई से अनजान ख़ुद ही अपने आप को महान और किस्मत का धनी होने के भ्रम में, अपने ही सीमित खोल में बनाये काल्पनिक संसार में संतुष्ट है. जब कभी, वह अपने इस काल्पनिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर, खोल के बाहर झांकेगा, तो आवश्य ही इस संसार की क्रूर हकीकतें उसे निष्पक्ष नहीं रहने देंगीं. अगर वह ईमानदार है तो वह सच्चाई, न्याय और गौरव के पक्ष में खड़ा होगा. परन्तु सच्चाई को समझकर भी, यदि वह निष्पक्ष और गैर राजनितिक होने का नाटक करता है तो वह दम्भी है, सच का सामना करने से घबराता है. भविष्य का आजाद मनुष्य, मानवीय इतिहास के इस बेरहम और मुश्किल दौर में, उस द्बारा दिखाई गई कायरता पर अवश्य सवाल उठाएगा.

3 Responses

  1. यहां,
    मीठे देश…. के बजाय, संभवत:

    प्‍यारे देश….

    होना चाहिए।

    और, चुप्‍पी की गिद्ध….के बजाय

    चुप्‍पी का गिद्ध

    और

    …आँत नोच लेगी… के बजाय

    आंत नोच लेगा….

    होना चाहिए,

    यदि मूल कविता मिल जाए तो शायद ठीक से बताया जा सकता है

    आप लोग अच्‍छा प्रयास कर रहे हैं, जारी रखिए…

  2. संदीप जी, मूल रचना के लिए आप ‘ओटो रेनी कैस्टिलो’ क्लिक करें.
    सार और रूप के द्वंद में हम सार की और ज्यादा झुक जाते हैं जिसके औचित्य को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता. आप जैसे साथी ही हमारे मार्गदर्शक हैं.

  3. [...] होने का ढोंग करता है. इस प्रकार के ‘ गैर- राजनितिक बुद्धिजीवी’ के लिए हमने एक टिपण्णी के प्रत्युत्तर [...]

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