चीनी विशेषता वाले ”समाजवाद” में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति

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नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है।

क्रान्तिकारी चीन में स्वास्थ्य की स्थिति

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में 1949 में सर्वहारा वर्ग सत्ता पर काबिज़ हुआ तो उसने मेहनतकश जनता के लिए, जोकि अधिकांशतः ग्रामीण इलाकों में रहती थी, स्वास्थ्य सेवाओं का एक तन्त्र विकसित किया था। सभी अस्पतालों का स्वामित्व फण्डिंग और संचालन सरकार की ज़िम्मेदारी थी और निजी तौर पर स्वास्थ्य सेवाएँ देने का चलन बन्द हो गया। ग्रामीण इलाकों में कम्यून ही स्वास्थ्य सेवाओं सहित अन्य सामाजिक सेवाओं की आपूर्ति भी करते थे। अधिकांश स्वास्थ्य सेवाएँ सहकारी चिकित्सा तन्त्र के जरिए उपलब्ध करायी जाती थीं, जो गाँवों और शहरों के स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से ये सेवाएँ प्रदान करता था। इन स्वास्थ्य केन्द्रों का दायित्व पश्चिमी और पारम्परिक चीनी उपचार के लिए बुनियादी प्रशिक्षण प्राप्त बेयरफुट डाक्टर सँभालते थे। इन सब प्रयासों का परिणाम आश्चर्यजनक था। 1952 से 1982 तक, शिशु मृत्यु दर प्रति एक हज़ार पर 200 से घटकर 34 रह गयी थी और औसत आयु 35 से बढ़कर 68 वर्ष हो गयी थी। (बेयरफुट यानी नंगे पाँव वाले डाक्टर चीन का एक अद्भुत प्रयोग था। इसके तहत हज़ारों लोगों को इलाज का बुनियादी प्रशिक्षण देकर गाँवों और शहरों में भेजा गया थां आम तौर पर होनेवाली बीमारियों के इलाज के साथ.साथ वे लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियाँ भी देते थे।)

संशोधनवादियों के सत्ता पर काबिज़ होने के बाद 1980 के आरम्भ में, चीन की अर्थव्यवस्था के विकेन्द्रीकरण और निजीकरण के कारण उसका स्वास्थ्य सेवा तन्त्र चरमरा गया क्योंकि अब उत्पादन, राज.काज और वितरण सर्वहारा वर्ग के बजाय पूँजीपति वर्ग के हाथों में आ गया था। अब संशोधनवादी सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में ख़र्च को 1978 के 32 प्रतिशत की तुलना में घटाकर 1999 में 15 प्रतिशत कर दिया और यह ज़िम्मेदारी प्रान्तीय और स्थानीय अधिकारियों के सिर मढ़ दी। इससे, सम्पन्न तटीय प्रान्तों को लाभ हुआ और शहरी तथा ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अन्तर बढ़ गया। निजीकरण के बाद स्वास्थ्य सेवाएँ अपने ख़र्चों की भरपाई के लिए निजी बाज़ार में सेवाएँ बेचने के लिए बाध्य हो गयीं।

हालाँकिए कम्युनिस्ट होने का दिखावा करने के लिए संशोधनवादी सरकार ने नियमित चिकित्सकीय मुलाकात और आपरेशानोँ, सामान्य नैदानिक परीक्षणों और नियमित दवाओं की कीमतों पर नियन्त्रण बनाये रखा। फ़िर भी, स्वास्थ्य केन्द्र नयी दवाओं और परीक्षणों से मुनाफा कमा सकते थे। बेहद मुनाफा देने वाली नयी दवाओं और तकनोलाजियोँ के जरिए राजस्व बटोरने पर अस्पतालों के चिकित्सकों को बोनस दिया जाने लगा। स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी से महँगी दवाओं और उच्च तकनीकी सेवाओं की बिक्री में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। इन सब कारणों से चीन की आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ हासिल करना मुश्किल हो गया। इसका कारण यह भी था कि कृषि अर्थव्यवस्था के निजीकरण के कारण 90 करोड़ ग़रीब ग्रामीण जनता अब असुरक्षित हो गयी है और उसका चिकित्सा बीमा नहीं है। बेयरफुट डाक्टर निजी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने को मजबूर हो गए। उन्होंने तनख़्वाहों और सुविधाओं में कटौती के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ देना बन्द कर दिया, और दवाएँ बेचना शुरू कर दिया जिसके ज़रिये अपनी बुनियादी जरूरतें पूरा करना आसान था। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी दवाओं की कीमतों में तेज़ी से वृद्धि हुई।

अर्थव्यवस्था के साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य तन्त्र के निजीकरण के बाद केन्द्र सरकार ने स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के कोष में कटौती कर दी। इसकी भरपायी के लिए स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को यह छूट दी गयी कि वे व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवाओं और होटलों तथा रेस्टोरेण्ट आदि में स्वच्छता के निरीक्षण आदि का शुल्क वसूल कर आमदनी जुटायें। इसके साथ ही स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने आमदनी बढ़ाने वाली गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर दिया और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता.शिक्षाए माँओं और बच्चों के स्वास्थ्य तथा महामारियों पर नियन्त्रण की उपेक्षा करना शुरू कर दिया।

जैसाकि होना था, “बाज़ार समाजवाद” की नीतियों के कारण गाँव.शहर, अमीर.ग़रीब, शारीरिक श्रम.मानसिक श्रम के बीच की खाई निरन्तर चौड़ी होती गयी। आय में असमानता के कारण शहरी मध्यवर्ग और अन्य खाते.पीते तबके के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की खपत ग्रामीण जनता की तुलना में तीन गुना ज़्यादा हो गयी। 1999 में, चीन की 49 प्रतिशत शहरी जनता के पास स्वास्थ्य बीमा था, जबकि ग्रामीण जनता में केवल 7 प्रतिशत को ही यह सुविधा उपलब्ध थी। ये 7 प्रतिशत भी ज़्यादातर नये उभरे धनी किसान और खाते.पीते किसान थे।

असन्तोष को रोकने के सरकारी “प्रयास”

अपनी ही नीतियों के कारण बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी को लेकर चीन के नये पूँजीवादी शासक परेशान होने लगे हैं क्योंकि जगह.जगह मज़दूरों के बीच से असन्तोष और आन्दोलन उभरने लगे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के बाद ग़रीब जनता में फैलते गुस्से को भाँपकर उन्होंने पिछले कुछ समय में इसमें से कुछ सुधार करने की कोशिश की हैं। रोज़गारदाता की ओर से वित्तपोषित आपातस्थिति बीमाए और चिकित्सा बचत खाता अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें लोगों को अपने चिकित्सा व्यय के कुछ हिस्से के लिए पैसा जमा करना पड़ता है। चिकित्सा बचत खातों से स्वास्थ्य सेवा के लिए कर्मचारी के वार्षिक वेतन के 10 प्रतिशत तक का भुगतान किया जाता है, जिसके बाद आपातस्थिति योजना लागू होती है।

लेकिन कुछ नियोक्ता यह कहकर इसे मानने से इन्कार कर देते हैं कि वे अपने अंशदान का ख़र्च उठा सकते। हकीकत यह भी है कि अधिकांश शहरी आबादी संगठित क्षेत्र में काम नहीं करती है। मज़दूरों को लाभ देने से बचने के लिए आये दिन कम्पनी बनायी जाती है और बन्द की जाती है, फ़िर उसे दूसरे नाम से चालू कर दिया जाता है। यही नहीं, मज़दूरों पर निर्भर उनके परिवार के सदस्य इन योजनाओं के अन्तर्गत नहीं आते। चीन का निजी स्वास्थ्य बीमा उद्योग मुट्ठीभर धनिकों का ही बीमा करता है जो इसका ख़र्च उठा सकते हैं, उस पर तुर्रा यह कि स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में भी विदेशी कंपनियों को न्यौता देने की योजना पर विचार किया जा रहा है।

यह तय है कि चीन की संशोधनवादी सरकार बढ़ती बेरोज़गारी, ख़राब स्वास्थ्य, अशिक्षा, आवास न होने आदि से बढ़ते असन्तोष को कम करने के लिए जितनी भी बन्दरकूद कर ले, अब न तो उसकी इच्छा है और न ही उसके बस में है कि बोतल से निकले इस पूँजीवादी जिन्न को वह कैद कर सके। अब मुनाफा रूपी पूँजीवादी जिन्न चीन में तबाही.बदहाली को लगातार बढ़ायेगा और इस तरह ख़ुद अपनी कब्र खोदने वालों को ही तैयार करेगा। चीन से आ रही छिटपुट ख़बरों से यह पता चलता है कि वहाँ की जनता अब माओकालीन समाजवादी चीन की उपलब्धियों को दोबारा याद करने लगी है और चीनी विशेषता वाले समाजवाद के इस छलावे को समझने लगी है।

- सन्दीप

आपस की बात

मित्रवत साथियो,
क्या आप जानते हैं कि शोषण करने वाला शोषण सहने वाले से ज्यादा गुनहगार होता है। और सभी जानते हैं, शोषण सहने वाला अधिक परिश्रमी होता है और शोषण करने वाला ऐयाशबाज़ होता है और हवेली में आरामदेह जीवन बिताता है।
लेकिन ऐसा क्यों?

ऐसा सवाल एक नहीं है बल्कि बहुत अधिक संख्या में हैं। लेकिन इन सवालों का जवाब एक ही है और वह है `अज्ञानता´। जो दिमाग़ और आँख होते हुए भी उन पर पट्टी बँधी हुई है। जो आज के हालात में `जानवर और मनुष्य एक समान जीने को मज़बूर है´, ऐसा क्यों? आप खुद समझिये और विचार कीजिये। आपके घर बैल होगा, अगर नहीं भी होगा तो सुने तो ज़रूर होंगे, बेचारा कितना मासूम परिश्रमी होता है। पूरे साल का अनाज पैदा करने में सहायता करता है। क्या उसका अधिकार नहीं है कि सोने के लिए पलंग मिले, उसका मालिक हमाम साबुन से नहाये तो उसे भी नहाने का हक हो, उसे भी अच्छे कपड़े मिलें, उसे भी खाने को अच्छा भोजन मिले, आपकी सम्पति में भी आधा हक हो।

लेकिन हम लोग क्यों नहीं देते? हम लोग जानते हैं कि बैलों में न तो एकता बनेगी, न ही हमारे खिलाफ बोल सकते हैं, न ही हड़ताल कर सकते हैं और तो और उसे हम मार-पीट भी सकते हैं। खाना देना बन्द कर सकते हैं।

तो क्या आप भी बैल हैं? नहीं? तो ऐसा क्यों कि आपके एक दिन की मज़दूरी यही होती है कि आप शाम को खाओ तो सुबह के लिए नयी कमाई का इन्तज़ार और इन्तज़ाम करना पड़ता है। आप अपने पेट और सिर्फ पेट के लिए काम नहीं करते हैं। आपके बीवी-बच्चे होंगे। अगर नहीं हैं तो आने वाले दिनों में तो होंगे ही। एक दिन की मज़दूरी उसे कहते हैं जो बीवी-बच्चों या परिवार के लिए दो वक्त की रोटी मुहैया करायें थोड़ा खुले आसमान के नीचे साँस ले सकें। परिवार के साथ कुछ पल बिता सकें, लेकिन इस पूँजीवादी युग में ऐसा कहाँ सम्भव है। इसी कारण, दोस्तो, अपनी दुर्दशा दूसरों को सुनाते हुए ऐसा लगता है कि हम लोग उस बैल की भाँति ही जीवन बिता रहे हैं।

लेकिन दोस्तो, उस बैल को लोग इतना चारा तो डालते हैं कि उसे खाकर वह मस्त हो जाये और काम पर लग सके। लेकिन दोस्तो, आपको इस बदलते युग (पूँजीवादी) में कोई पूछने भी नहीं आयेगा। आप सब क्यों जानते हुए भी जानवरों की तरह जीना चाहते हैं? यह भी कोई ज़िन्दगी है? आज अपनी मजबूरी दूर करने के लिए 8 घण्टे काम करो, 12 घण्टे खटो, 16 घण्टे लगाओ या साथी तुम पूरा वक्त लगाओ, चाहे मालिकों के पीछे पूरी ज़िन्दगी लगाओ, तुम मर जाओगे लेकिन तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा और तुम ज़िन्दगी में कभी सुख का अनुभव नहीं कर पाओगे। कुछ गिने-चुने लोग कम्पनी में यह कहते हुए भी सुने होंगे- “हमारी कम्पनी में आठ घण्टे काम चलता है। तो क्या पैसा बनेगा? ओवर टाइम तो लगता नहीं तो क्या बचेगा?” “हम तो उस कम्पनी में टाइम ज्यादा लगाते थे तो पैसा अच्छा बचता था और सुख से रहते थे”। लेकिन साथियो, यह सुख वाली बात नहीं है बल्कि उसी से तुम दुखी हो। 8 घण्टे में पैसा पूरा नहीं मिला। अब मनोरंजन के समय को काम में लगाकर ओवर टाइम करते हो और परिवार का ख़र्च चलाते हो। यह सुख की बात है? यह बिल्कुल मूर्खता है। अगर आप ऐसा सोचोगे तो आपके बच्चे भी गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़े जायेंगे – जैसेकि कुछ जगहों पर बँधुआ मज़दूर दिखते हैं। अत: साथियो, समय रहते विकल्प को अपनाना होगा – गुलामी करते हुए, नर्क जैसा जीवन जीते हुए दिन बिताओ या फ़िर इस पूँजीवादी, जनफरोश, भ्रष्ट शासन व्यवस्था को ख़त्म करने का प्रण करो।

अत: साथियो जीवन में बदलाव लाने के लिए ज़रूरी है कि संघर्ष करना सीखो और वास्तविक मज़दूर नेता या आपका ही कोई साथी जो पहले मालिको के शोषण का शिकार हुआ है, आपके सामने आये और संघर्ष के लिए प्रेरित करे तो फौरन आपका उसके प्रति फ़र्ज़ बनता है कि कदम से कदम मिलाकर चलने का वादा करें। दूसरी बात यह है कि इस पूँजीवादी युग में ऐसा कोई अख़बार नहीं है जो मज़दूरों की पूरी ख़बर का 25 प्रतिशत भी छापता हो। है तो बस एक ही। वह है बिगुल अख़बार। जो आपकी समस्या का 100 प्रतिशत बताता है।
- नरेन्द्र कुमार बिगुल का सदस्य बजाज सन्स लिमिटेड, सी-103, फेज-5, फोकल प्वाइण्ट, लुधियाना

चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत

चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत देशभर के

सफाईकर्मियों का आईना है

मशहूर भारतीय फ़िल्मकार सत्यजित रे ने अपनी एक फ़िल्म अमेरिका में प्रदर्शित की तो पहले शो में ही बहुत से अमेरिकी फ़िल्म बीच में ही छोड़कर आ गये क्योंकि सत्यजीत रे ने फ़िल्म के एक सीन में भारतीय लोगों को हाथों से खाना खाते हुए दिखाया था जिसे देखकर उन्हें वितृष्णा होने लगी थी। लेकिन अगर उन्हें इंसान के हाथों से सीवरेज की सफाई होती दिखला दी जाती तो शायद वे बेहोश हो जाते। सिर्फ अमेरिकी ही क्यों, इस नर्क के दर्शन से तो बहुत से भारतीय भी बेहोश हो जायेंगे। लोग अपने घरों में साफ-सुथरा टायलट इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे शायद ही कभी सोचते हों कि उनके इस टायलट को साफ रखने के लिए इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जान दे देते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे लोग एक साफ-सुथरी, ‘‘हाइजेनिक’’ ज़िन्दगी जी सकें।

बहुत सारी ज़िन्दगियाँ इस तरह की भी हैं जो हर रोज़ इंसान की गन्दगी से भरे गटरों-मैनहोलों आदि में उतरती हैं। महज़ 90 या हद से हद 110 रुपये की दिहाड़ी कमाने के लिए। पिछले दिनों चेन्नई म्यूनीसिपल कॉर्पोरेशन सम्बन्धी आयीं रिपोर्टें कुछ ऐसे ही तथ्य पेश करती हैं। चेन्नई मैटरो जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड का कहना है कि 24 मई 2003 और 17 अक्टूबर 2008 के बीच 17 सीवर कर्मचारियों की मौत, मैनहोलों या गटर की सफाई करते समय गन्दी ज़हरीली गैस चढ़ने से हो गयी। सफाई कर्मचारियों की ट्रेडयूनियनों का कहना है कि यह गिनती पिछले दो दशकों में 1,000 के नज़दीक पहुँचती है। यही नहीं जो कामगार ज़िन्दा भी हैं, वे हर समय कार्बन मोनोआक्साईड, हाइड्रोजन सलफाइड और मीथेन जैसी ज़हरीली गैसों के सीधे सम्पर्क में रहने से कई प्रकार की साँस की बीमारियों के शिकार हैं। यही नहीं, दस्त, टाइफाइड और हैपीटाइटस-बी इन कामगारों में पाये जाने वाले सामान्य रोग हैं। ई. कौली नामक बैक्टीरिया पेट के बहुत गम्भीर रोगों का जन्मदाता है और क्लोसटरीडम टैटनी नामक बैक्टीरिया खुले जख्मों के सीधे सम्पर्क में आने से टैटनस का कारण बनता है। ये सारे बैक्टीरिया गन्दे पानी में आमतौर पर पाये जाते हैं और चमड़ी के रोग इतने हैं कि गिने नहीं जा सकते।

चेन्नई के 5.63 लाख घरों के कनेक्शनों वाला 78,861 मैनहोलों सहित 2,671 किलोमीटर लम्बे सीवरेज नेटवर्क को सँभालने के लिए सिर्फ 4,000 ही कर्मचारी हैं जबकि 1978 में इनकी गिनती 11,000 थी। इस सारी प्रक्रिया में जो सबसे अमानवीय बात है वह यह है कि आज भी मैनहोलों को साफ करने के लिए सफाई कर्मचारी उनके अन्दर उतरते हैं और सारी सफाई हाथों से करते हैं। इम्पलायमेण्ट ऑफ़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एण्ड कंस्टरक्शन ऑफ़ ड्राई लैटरीन्ज़ (प्रोविजनल) एक्ट 1993 के तहत मानवीय हाथों से मैनहोल या गटर  तो क्या घरों के सैप्टिक टैंक भी साफ करना ग़ैर-कानूनी है। लेकिन हमारे देश के अन्य सभी कानूनों की तरह यह कानून भी महज़ काग़ज़ी ही है। इस कानून की धज्जियाँ उड़ते हुए आप किसी भी मैनहोल पर चलते काम के समय देख सकते हैं। यहाँ तक कि इन सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा के इन्तज़ाम तक मुहैया नहीं करवाये जाते। कानूनन ऑक्सीजन सिलण्डर हर समय सफाई कर्मचारी के पास होना चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते यह हो पाना सम्भव ही नहीं है। बड़ी गिनती में सफाई कर्मचारी ठेके पर भर्ती किये जाते हैं। इतने बड़े शहर चेन्नई में मैनहोलों के बीच की सिल्ट साफ करने के लिए अगर उन्नत तकनीक अपनायी जाये तो होने वाली मौतें कम की जा सकती हैं। वैसे तो तमिलनाडू सरकार ने पिछले कई वर्षों से अण्डरग्राउण्ड सीवरेज स्कीम का शोशा भी छोड़ रखा है। जिसके तहत सभी सीवरेज महकमे का मशीनीकरण किया जायेगा। इस स्कीम की हवा तभी निकलती दिखती है जब यह पता चलता है कि 148 नगर निगमों में से सिर्फ 6 नगर निगमों में ही यह स्कीम पूरी हो पायी है।

उपरोक्त दिये गये तथ्यों में चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत का ही पता नहीं चलता बल्कि यह तो पूरे देश के सफाई कामगारों की ज़िन्दगी की एक धुँधली सी तस्वीर है जो हमेशा ख़ूबसूरत शहरों की परतों के नीचे दबी रहती है। असल तस्वीर इससे भी कहीं भयानक है।

- अजयपाल

मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन

मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन जब मज़दूरों के बहते ख़ून से जन्मा लाल झण्डा

मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर सोलह- सोलह घण्टे तक खटते थे। सारी दुनिया में अलग-अलग इस माँग को लेकर आन्दोलन होते रहे थे। अपने देश में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाने पर 1886 में अमेरिका के विभिन्न मज़दूर संगठनों ने मिलकर आठ घण्टे काम के दिन की माँग पर एक विशाल आन्दोलन खड़ा करने का फैसला किया।raising the flag

एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज़्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकला।

उधर मज़दूरों की बढ़ती ताकत और उनके नेताओं के अडिग संकल्प से भयभीत उद्योगपति लगातार उन पर हमला करने की घात में थे। सारे के सारे अख़बार (जिनके मालिक पूँजीपति थे।) “लाल ख़तरे” के बारे में चिल्ल-पों मचा रहे थे। पूँजीपतियों ने आसपास से भी पुलिस के सिपाही और सुरक्षाकर्मियों को बुला रखा था। इसके अलावा कुख्यात पिंकरटन एजेंसी के गुण्डों को भी हथियारों से लैस करके मज़दूरों पर हमला करने के लिए तैयार रखा गया था। पूँजीपतियों ने इसे “आपात स्थिति” घोषित कर दिया था। शहर के तमाम धन्नासेठों और व्यापारियों की बैठक लगातार चल रही थी जिसमें इस “खतरनाक स्थिति” से निपटने पर विचार किया जा रहा था।

3 मई को शहर के हालात बहुत तनावपूर्ण हो गये जब मैकार्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कम्पनी के मज़दूरों ने दो महीने से चल रहे लाक आउट के विरोध में और आठ घण्टे काम के दिन के समर्थन में कार्रवाई शुरू कर दी। जब हड़ताली मज़दूरों ने पुलिस पहरे में हड़ताल तोड़ने के लिए लाये गये तीन सौ ग़द्दार मज़दूरों के खि़लाफ मीटिंग शुरू की तो निहत्थे मज़दूरों पर गोलियाँ चलायी गयीं। चार मज़दूर मारे गये और बहुत से घायल हुए। अगले दिन भी मज़दूर ग्रुपों पर हमले जारी रहे। इस बर्बर पुलिस दमन के खि़लाफ चार मई की शाम को शहर के मुख्य बाज़ार हे मार्केट स्क्वायर में एक जनसभा रखी गयी। इसके लिए शहर के मेयर से इजाज़त भी ले ली गयी थी।

मीटिंग रात आठ बजे शुरू हुई। करीब तीन हज़ार लोगों के बीच पार्सन्स और स्पाइस ने मज़दूरों का आह्नान किया कि वे एकजुट और संगठित रहकर पुलिस दमन का मुकाबला करें। तीसरे वक्ता सैमुअल फील्डेन बोलने के लिए जब खड़े हुए तो रात के दस बज रहे थे और ज़ोरों की बारिश शुरू हो गयी थी। इस समय तक स्पाइस और पार्सन्स अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वहाँ से जा चुके थे। इस समय तक भीड़ बहुत कम हो चुकी थी – करीब दो सौ लोग ही रह गये थे। मीटिंग करीब-करीब ख़त्म हो चुकी थी कि 180 पुलिसवालों का एक जत्था धड़धड़ाते हुए हे मार्केट स्क्वायर आ पहुँचा। उसकी अगुवाई कैप्टन बानफील्ड कर रहा था जिससे शिकागो के नागरिक उसके क्रूर और बेहूदे स्वभाव के कारण नफरत करते थे। मीटिंग में शामिल लोगों को चले जाने का हुक्म दिया गया। सैमुअल फील्डेन पुलिसवालों को यह बताने की कोशिश ही कर रहे थे कि यह शान्तिपूर्ण सभा है, कि इसी बीच किसी ने मानो इशारा पाकर एक बम फेंक दिया। आज तक बम फेंकने वाले का पता नहीं चल पाया है। शिकागो में यह माना जाता है कि बम फेंकने वाला पुलिस का भाड़े का टट्टू था। स्पष्ट था कि बम का निशाना मज़दूर थे लेकिन पुलिस चारों और फैल गयी थी और नतीजतन बम का प्रहार पुलिसवालों पर हुआ। एक मारा गया और पाँच घायल हुए। पगलाये पुलिसवालों ने चैक को चारों ओर से घेरकर भीड़ पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। जिसने भी भागने की कोशिश की उस पर गोलियाँ और लाठियाँ बरसायी गयीं। छः मज़दूर मारे गये और 200 से ज़्यादा जख्मी हुए। मज़दूरों ने अपने ख़ून से अपने कपड़े रँगकर उन्हें ही झण्डा बना लिया। तभी से मज़दूरों के झण्डे का रंग लाल हो गया।

इस घटना के बाद पूरे शिकागो में पुलिस ने मज़दूर बस्तियों, मज़दूर संगठनों के दफ़्तरों, छापाख़ानों आदि में ज़बरदस्त छापे डाले। प्रमाण जुटाने के लिए हर चीज़ उलट-पुलट कर डाली गयी। सैकड़ों लोगों को मामूली शक पर पीटा गया और बुरी तरह टार्चर किया गया। हज़ारों गिरफ्ऱतार किये गये।

आठ मज़दूर नेताओं – अल्बर्ट पार्सन्स, आगस्टस स्पाइस, जार्ज एंजेल, एडाल्फ फ़िशर, सैमुअल फील्डेन, माइकेल श्वाब, लुइस लिंग्ग और आस्कर नीबे पर मुकदमा चलाकर उन्हें हत्या का मुजरिम करार दिया गया। इनमें से सिर्फ एक, सैमुअल फील्डेन बम फटने के समय घटना स्थल पर मौजूद था। जब मुकदमा शुरू हुआ तो सात लोग ही कठघरे में थे। डेढ़ महीने तक अल्बर्ट पार्सन्स पुलिस से बचता रहा। वह पुलिस की पकड़ में आने से बच सकता था लेकिन उसकी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया कि वह आज़ाद रहे जबकि उसके बेकसूर साथी फर्जी मुकदमें में फँसाये जा रहे हों। पार्सन्स ख़ुद अदालत में आया और जज से कहा, “मैं अपने बेकसूर कामरेडोँ के साथ कठघरे में खड़ा होने आया हूँ।”

पूँजीवादी न्याय के लम्बे नाटक के बाद 20 अगस्त 1887 को शिकागो की अदालत ने अपना फैसला दिया। सात लोगों को सज़ाए-मौत और एक (नीबे) को पन्द्रह साल कैद बामशक्कत की सज़ा दी गयी। स्पाइस ने अदालत में चिल्लाकर कहा था कि “अगर तुम सोचते हो कि हमें फाँसी पर लटकाकर तुम मज़दूर आन्दोलन को… ग़रीबी और बदहाली में कमरतोड़ मेहनत करनेवाले लाखों लोगों के आन्दोलन को कुचल डालोगे, अगर यही तुम्हारी राय है – तो ख़ुशी से हमें फाँसी दे दो। लेकिन याद रखो … आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो लेकिन यहाँ-वहाँ, तुम्हारे पीछे, तुम्हारे सामने, हर ओर लपटें भड़क उठेंगी। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे।”

सारे अमेरिका और तमाम दूसरे देशों में इस क्रूर फैसले के खि़लाफ भड़क उठे जनता के गुस्से के दबाव में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो अपील मानने से इन्कार कर दिया लेकिन बाद में इलिनाय प्रान्त के गर्वनर ने फील्डेन और श्वाब की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया। 10 नवम्बर 1887 को सबसे कम उम्र के नेता लुइस लिंग्ग ने कालकोठरी में आत्महत्या कर ली।

काला शुक्रवार

अगला दिन (11 नवम्बर 1887) मज़दूर वर्ग के इतिहास में काला शुक्रवार था। पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फ़िशर को शिकागो की कुक काउण्टी जेल में फाँसी दे दी गयी। अफसरों ने मज़दूर नेताओं की मौत का तमाशा देखने के लिए शिकागो के दो सौ धनवान शहरियों को बुला रखा था। लेकिन मज़दूरों को डर से काँपते-घिघियाते देखने की उनकी तमन्ना धरी की धरी रह गयी। वहाँ मौजूद एक पत्रकार ने बाद में लिखा: “चारों मज़दूर नेता क्रान्तिकारी गीत गाते हुए फाँसी के तख्ते तक पहुँचे और शान के साथ अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो हुए। फाँसी के फन्दे उनके गलों में डाल दिये गये। स्पाइस का फन्दा ज़्यादा सख्त था, फ़िशर ने जब उसे ठीक किया तो स्पाइस ने मुस्कुराकर धन्यवाद कहा। फ़िर स्पाइस ने चीख़कर कहा, ‘एक समय आयेगा जब हमारी ख़ामोशी उन आवाज़ों से ज़्यादा ताकतवर होगी जिन्हें तुम आज दबा डाल रहे हो।...’ फ़िर पार्सन्स ने बोलना शुरू किया, ‘मेरी बात सुनो… अमेरिका के लोगो! मेरी बात सुनो… जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकेगा…’ लेकिन इसी समय तख्ता खींच लिया गया।”

13 नवम्बर को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा शिकागो के मज़दूरों की एक विशाल रैली में बदल गयी। पाँच लाख से भी ज़्यादा लोग इन नायकों को आखि़री सलाम देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े।

तब से गुज़रे 123 सालों में अनगिन संघर्षों में बहा करोड़ों मज़दूरों का ख़ून इतनी आसानी से धरती में जज़्ब नहीं होगा। फाँसी के तख्ते से गूँजती स्पाइस की पुकार पूँजीपतियों के दिलों में ख़ौफ पैदा करती रहेगी। अनगिन मज़दूरों के ख़ून की आभा से चमकता लाल झण्डा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहेगा।